क्या आपने कभी सोचा है कि युद्ध की असली कीमत क्या होती है? यह सिर्फ जीत या हार का आंकड़ा नहीं, बल्कि उन टूटे हुए परिवारों, अधूरी यादों और सन्नाटे में गूंजती आवाज़ों का एक सागर है। श्रीराम राघवन की नई फिल्म 'इक्कीस' आपको इसी सागर की गहराइयों में ले जाती है। यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध के नायक, सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वीरगाथा से प्रेरित है, लेकिन यहाँ वीरता को तोपों और गोलियों के शोर में नहीं, बल्कि एक पिता की चुप्पी और एक प्रेमिका की अधूरी मुस्कान में तलाशा गया है।

अगर आप उम्मीद कर रहे हैं कि यह फिल्म आपको 'जोश' से भर देगी, तो शायद आप थोड़ा निराश हो सकते हैं। लेकिन अगर आप युद्ध के मानवीय पहलू को समझना चाहते हैं, तो 'इक्कीस' आपके दिल को छू लेगी। यह फिल्म आपसे एक सवाल पूछती है: क्या वीरता सिर्फ मैदान में दिखाई जाती है, या फिर उसके बाद जीने वालों के साहस में भी छुपी होती है?
कहानी: दो समय, एक दर्द
फिल्म की कहानी दो समय-रेखाओं में बुनी गई है, जैसे एक टूटे हुए दर्पण के दो टुकड़े जो अलग होकर भी एक ही चेहरे को दिखाते हैं।
- 1971 की कहानी: यहाँ हम एक युवा, आदर्शवादी अफसर अरुण खेत्रपाल (अगस्त्य नंदा) की यात्रा देखते हैं। उसकी ट्रेनिंग, उसके सपने और वह निर्णायक लड़ाई जिसने उसे परमवीर चक्र दिलाया।
- 2001 की कहानी: तीस साल बाद, हम अरुण के पिता एम.एल. खेत्रपाल (धर्मेंद्र) से मिलते हैं, जो अपने बेटे की कुर्बानी के साथ जी रहे हैं। उनकी यात्रा उन्हें पाकिस्तान के सरगोधा तक ले जाती है, जहाँ एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नासिर (जयदीप अहलावत) उनका स्वागत करता है।
इन दोनों धागों को जोड़ने वाली चीज है दर्द का साझापन। फिल्म यह नहीं दिखाती कि युद्ध कैसे लड़ा गया, बल्कि यह दिखाती है कि युद्ध के बाद क्या बचा।
अभिनय: भावनाओं का सिम्फनी
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं, जिन्होंने अपने किरदारों में सचमुच की जान फूंक दी है।
| कलाकार | किरदार | अभिनय का सार |
|---|---|---|
| धर्मेंद्र | एम.एल. खेत्रपाल (पिता) | खामोशी में बोलते दर्द का मास्टरक्लास। एक भी आंसू नहीं, लेकिन हर नज़र में सूनापन। |
| अगस्त्य नंदा | अरुण खेत्रपाल | एक युवा आदर्शवादी अफसर की ईमानदार और संयमित छवि। फिल्मी 'जोश' से परे की वास्तविकता। |
| जयदीप अहलावत | ब्रिगेडियर नासिर | सैन्य सम्मान और इंसानियत का सुंदर संतुलन। सीमित समय में गहरी छाप। |
| सिमर भाटिया | किरण (प्रेमिका) | अधूरे प्यार और टूटे सपनों का प्रतिनिधित्व। किरदार को और विस्तार मिल सकता था। |
धर्मेंद्र का अभिनय इस फिल्म की आत्मा है। वह बताते हैं कि कैसे एक पिता का दर्द शब्दों में नहीं, बल्कि उस सन्नाटे में बसता है जो उसके बेटे की जगह छोड़ गया है। [एक फिल्म समीक्षक के अनुसार]
निर्देशन और तकनीकी पहलू: सादगी में गहराई
श्रीराम राघवन ने जानबूझकर फिल्म को मेलोड्रामा और अतिनाटकीयता से दूर रखा है। यही इसकी सबसे बड़ी खूबी और, कुछ दर्शकों के लिए, चुनौती भी है।
- सिनेमैटोग्राफी: युद्ध के दृश्यों को विशेष effects (VFX) के भरमार के बजाय यथार्थवादी ढंग से दिखाया गया है। जलते टैंक का दृश्य विशेष रूप से प्रभावशाली है।
- पटकथा: लेखकों (अरिजीत बिस्वास, पूजा लाधा सुरती) ने भावनात्मक ईमानदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। हालाँकि, 143 मिनट की लंबाई के कारण फिल्म की गति कुछ हिस्सों में धीमी महसूस होती है।
- संगीत: यहाँ भी कम है ज्यादा वाला सिद्धांत काम करता है। कई महत्वपूर्ण क्षणों में खामोशी ही सबसे मार्मिक संगीत बन जाती है।
मुख्य बातें: इक्कीस आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
अगर आप तय नहीं कर पा रहे हैं कि इस फिल्म को देखें या नहीं, तो इन बातों पर गौर करें:
- देखें अगर: आप युद्ध फिल्मों के मानवीय पक्ष में दिलचस्पी रखते हैं। आप धर्मेंद्र के अंतिम और शायद सबसे यादगार अभिनय को देखना चाहते हैं। आप एक गंभीर, विचारपूर्ण और संयमित कहानी देखने के मूड में हैं।
- न देखें अगर: आप तेज-रफ्तार एक्शन और देशभक्ति के नारों वाली फिल्म की तलाश में हैं। आप हल्के-फुल्के मनोरंजन के लिए सिनेमा जा रहे हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. क्या 'इक्कीस' एक सच्ची कहानी पर आधारित है? हाँ, यह फिल्म परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन और बलिदान से प्रेरित है, जिन्होंने 1971 के युद्ध में अदम्य साहस दिखाया था।
2. क्या यह फिल्म बच्चों के लिए उपयुक्त है? फिल्म में कोई हिंसक या अश्लील दृश्य नहीं हैं, लेकिन इसकी गंभीर भावनात्मक गहराई और धीमी गति छोटे बच्चों को बोर कर सकती है। यह किशोरों और वयस्कों के लिए अधिक उपयुक्त है।
3. फिल्म की लंबाई एक समस्या है? कुछ दर्शकों को 143 मिनट की लंबाई और दूसरे हाफ में भावनात्मक दृश्यों की अधिकता थोड़ी खिंचाव भरी लग सकती है। हालाँकि, जो लोग चरित्रों के साथ जुड़ जाते हैं, उनके लिए यह लंबाई जरूरी महसूस होती है।
4. अगस्त्य नंदा का डेब्यू कैसा रहा? अगस्त्य नंदा ने एक चुनौतीपूर्ण भूमिका को बहुत ईमानदारी और संयम के साथ निभाया है। वह एक 'सुपरस्टार' की तरह नहीं, बल्कि एक वास्तविक, संघर्षशील युवा अफसर की तरह दिखते हैं, जो फिल्म के यथार्थवादी टोन के अनुकूल है।
निष्कर्ष
'इक्कीस' एक साहसिक फिल्म है, लेकिन उस साहस में जोखिम नहीं, बल्कि संवेदनशीलता है। यह आपको रोमांचित नहीं करेगी, बल्कि विचारों में डुबो देगी। यह फिल्म युद्ध के बारे में नहीं, बल्कि शांति, याद और माफी के बारे में है। अपनी कुछ गति संबंधी कमियों के बावजूद, यह फिल्म धर्मेंद्र के अद्वितीय अभिनय और एक दुर्लभ, परिपक्व कहानी कहने के अंदाज़ के लिए देखी जानी चाहिए। अगर आप बॉलीवुड की रूढ़ियों से परे कुछ देखना चाहते हैं, तो 'इक्कीस' आपका इंतज़ार कर रही है।