महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग की पौराणिक कथा और इतिहास - Mahakaleshwar Jyotirlinga

महाकालेश्वर, भगवान शंकर के तृतीय ज्योतिर्लिंग हैं इनका वर्णन शिवपुराण के कोटिरुद्र संहिता के 16 वें अध्याय में मिलता है महाकाल के रूप में विराजमान स्वयंभू हैं इन ज्योतिपुंज के दर्शन के फल से ही काल सर्प दोष और अल्पायु का निवारण होता है।

mahakaleshwar jyotirlinga

महादेव शंभूनाथ अनेकों संकटों को पल में हरने वाले तथा भक्तिभाव से एक लोटे जल से भी प्रसन्न होने वाले ईष्ट हैं उनकी शक्ति और दया अपरम्पार है आइए जानते हैं महाकालेश्वर की पौराणिक कथा, मंदिर का इतिहास और अन्य तथ्य। 

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मन्दिर

मन्दिर का नाममहाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग
अवस्थितमध्यप्रदेश के उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे।
विराजमानभगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में
ज्योतिर्लिंग का स्थानतृतीय ज्योतिर्लिंग
वर्तमान में जीर्णोद्धारमराठा साम्राज्य के राणोजी सिंधिया जी द्वारा
शाशी निकायमध्यप्रदेश सरकार द्वारा रख रखाव

महाकाल शब्द का अर्थ होता है जो समय या मृत्यु से परे हो, दूसरा काल से तात्पर्य "चक्र" से होता है भौतिक रूप से देखा जाए तो जब पृथ्वी सूर्य का एक परिक्रमा करती है तो दिन और रात होते हैं ऐसे ही समस्त ब्रह्मांड एक दूसरे से चक्र में बंधा हुआ है।

वह ईश्वर जो ब्रम्हांड के समस्त चक्रों से परे है समस्त सृष्टि जिसके अंदर समाहित हो और समय के तीन वर्तमान, भूत, भविष्य उनके वश में हों उन्हें ही "महाकाल" कहते हैं महाकालेश्वर मंदिर में भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में तीसरा शिवलिंग यहां विराजमान है ज्योतिर्लिंगों में यह इकलौता दक्षिणमुखी स्वयंभू है इसीलिए इन्हें दक्षिणेश्वर भी कहा जाता है।

"आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्।
भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।"

श्लोक से अभिप्राय है कि आकाश में तारक, पाताल में हाटकेश्वर और धरती में महाकालेश्वर ही सम्पूर्ण और सर्वोत्तम शिवलिंग हैं। महाकाल के दर्शन मात्र से ही मोक्ष और पुण्य की प्राप्ति होती है।

महाकालेश्वर मन्दिर कहा स्थित है

महाकाल का यह मंदिर मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है महाभारत काल में इस शहर को उज्जयनी कहते थे और यहां के राजा महाकाल हैं मन्दिर के समीप क्षिप्रा नदी बहती है इसी के तट पर सिंहस्थ कुम्भ मेले का आयोजन होता है। उज्जैन का उल्लेख स्कन्द पुराण में "अवंती खण्ड" और रामायण में बाल्मिकी जी ने इसे "अवंती नगर" लिखा है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग कैसे पहुँचे

महाकाल की नगरी पहुंचने के लिए ट्रेन द्वारा जा सकते हैं देश के सभी छोटे बड़े स्टेशन उज्जैन से सम्बद्ध हैं मन्दिर की दूरी उज्जैन रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किलोमीटर की होगी।

बस द्वारा भी आसानी से पहुंचा जा सकता है यदि आप सड़क मार्ग से आ रहे हैं तो पास के नगर इंदौर के लिए किसी भी राज्य से बस सेवा होगी, इंदौर से उज्जैन 45 किलोमीटर की दूरी पर है निजी वाहनों से आने के लिए भी सड़कें पर्याप्त हैं। अगर भक्तगण हवाई यात्रा से महाकाल के दर्शन करने जाना चाहते हैं तो अहिल्याबाई होलकर एयरपोर्ट इंदौर तक आ सकते हैं।

महाकालेश्वर मन्दिर का इतिहास

mahakaleshwar jyotirlinga temple and river photo

ऐतिहासिक रूप से इस मन्दिर की स्थापना के बारे में सटीक दिनाँक या समय बता पाना मुमकिन नही है लेकिन पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि इस मन्दिर की पूजा सबसे पहले सृष्टि के रचैता श्री ब्रम्हदेव ने की थी। कुछ इतिहासकर इसे प्रागैतिहासिक काल का बताते हैं इतिहास में मन्दिर से जुड़ी महत्त्वपूर्ण घटनाएं इस प्रकार हैं।

  • महाकाल के आशीर्वाद से महाराजा विक्रमादित्य का शासन इस क्षेत्र में 132 साल रहा इसका विस्तृत वर्णन कालीदास ने अपने काव्य "मेघदूत" में किया है मन्दिर के परिसर में ही राजा द्वारा न्याय सभा का आयोजन किया जाता था।
  • बाणभट्ट की "कादम्बिनी" में महाकालेश्वर मन्दिर की प्रशंशा मिलती है। 7वीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के समय बाणभट्ट उनके दरबार के रत्नों में थे।
  • 11वीं शताब्दी में मालवा क्षेत्र के महाराजा भोज ने विभिन्न मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था महाकाल मन्दिर के शिखर को ऊंचा करवाने का श्रेय इन्ही को जाता है।
  • दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इल्तुतमिश ने सन 1235ई. में मन्दिर को ध्वस्त कर दिया उसी समय पुजारी तथा अन्य लोगों ने मिलकर महाकाल के स्वयंभू लिंग को पास के कुएं में सुरक्षित छुपा दिया वह शिवलिंग वहीं पर 550 सालों तक रखा रहा। औरंगजेब के शासन काल में मन्दिर के स्थान पर मस्जिद बना दी गई।
  • लगभग 550 साल के अंतराल के बाद 1728 में मुगलों को हराकर हिंदू राजा रानोजी सिंधिया उज्जैन के रहा बने। सन 1732ई में रानोजी के नेतृत्व में मस्जिद तोड़कर पुनः मन्दिर का निर्माण हुआ और 550 साल से कुएं में ज्योर्तिलिंग को पुनः विराजमान कर स्थापित किया गया और सिंहस्थ मेले का आयोजन करवाया।

महाकालेश्वर मन्दिर की पौराणिक कथा

शिवपुराण में वर्णित कहानी के अनुसार प्राचीनकाल में अवंती(उज्जैन) में एक शिवभक्त परमज्ञानी ब्राह्मण रहता था जो प्रतिदिन प्रातः अग्निहोत्र यज्ञ कर पार्थिव शिवलिंग की स्थापना करते थे दिन भर शास्त्र और वैदिक परंपराओं शास्त्रविधि से पूजा पाठ किया करते थे। उनकी इन्ही तपस्या के संस्कारों का फल यह था कि उन्हें 4 पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई।
सारी संताने अत्यंत ज्ञानी और माता पिता के संस्कारों के अनुरूप थी उन चारों के नाम

  • देवप्रिय
  • प्रियमेघा
  • संस्कृत
  • सुव्रत्त थे।

समय बीतता गया और बालक शिक्षित होने के साथ साथ पिता की भांति महादेव की भक्ति में आनंदित थे उन्हीं दिनों रत्नमाल पर्वत पर एक दूषण नाम का राक्षस रहता था जिसे ब्रम्हादेव ने अजेय होने का वर दिया था उस असुर ने समस्त मानव जाति और पूजा पाठ करने वाले ब्राह्मणों पर आक्रमण करता था। एक दिन दूषण उज्जैनी पहुंचा वहां ब्राह्मण वेदप्रिय के चारो पुत्र पार्थिव शिवलिंगों की स्थापना कर उनकी आराधना में लीन थे असुर को यह देखकर क्रोध आया और उसने तुरन्त अपनी सेना के राक्षसों को आदेश दिया कि इन्हे बांधकर मार दिया जाए इतना सुनने के बाद भी ब्राह्मण बालक भयभीत नहीं हुए और पूरी भक्ति से भगवान शंकर की आराधना करते रहे।

जैसे ही असुर उन्हें कैद करने पहुंचते हैं तभी जोर से चारो तरफ की जमीन धंस कर गड्ढे का रूप ले लेती है और महादेव रुद्र रूप में प्रकट होकर दूषण को भस्म कर देते हैं यह देखकर बाकी राक्षस भाग जाते हैं। उन बालकों की भक्ति से प्रसन्न होकर महाकाल उन्हें वर मांगने के लिए कहते हैं बच्चों ने वर के रूप में मोक्ष की इच्छा जताई और शिवलिंग के रूप में वहीं भक्तों की रक्षा के लिए आग्रह किया कुमारों को मोक्ष का वरदान पूर्ण किया और वहीं महाकाल के रूप में विराजमान हो गए इन्हे ही महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग कहा गया।

महाकाल के मन्दिर से जुड़े कुछ तथ्य

भगवान महाकाल का मन्दिर कई चुनौतियां का सामना करने के बाद आज भी खड़ा है ऐसे में कुछ रहस्मय तथ्य होते हैं जो विस्मय और भक्ति जिजीविषा को बढ़ाते हैं।

  •  ज्योतिर्लिंग की आरती यहां पर शमशान में मुर्दे की जली ताजी राख से की जाती है जिसे भस्म आरती कहा जाता है।
  • ज्योतिर्लिंग के दर्शन पश्चात मन्दिर के परिसर में ही उपस्थित जूना महाकाल के दर्शन और कुछ दूर में काल भैरव और अर्धकालभैरव के दर्शन अनिवार्य माने जाते हैं।
  • गर्भगृह में ही माता पार्वती और पुत्र कार्तिकेय,गणेश की मूर्तियां है और महाकाल के सामने ही नंदी विराजमान हैं।
  • उज्जैन के राजा महाकाल हैं राजा विक्रमादित्य के जमाने में कोई भी मंत्री या राजा रात उस नगरी में नहीं बिताता था क्योंकि कहा जाता है कि वहां के राजा सिर्फ वही हैं।

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समापन

उज्जैन में स्थित महाकाल का यह मन्दिर भगवान शिव का सर्वोत्तम मन्दिर है इनके बारे में जानकारी के पूर्व लेखन सामग्री पर काफी शोध किया गया है त्रुटि होने पर हमे कमेन्ट में लिख भेजें अवश्य सुधार किया जाएगा। जय महाकाल!

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