क्या आप कभी कल्पना कर सकते हैं कि एक यूरोपीय राजकुमार, जिसकी रगों में शाही खून बहता हो, भारत के एक आश्रम में संन्यास लेकर दरबान बनकर रह सकता है? हम बात कर रहे हैं प्रिंस वेल्फ हनोवर की जो अपने परिवार सहित पुणे के ओशो आश्रम में शिष्य बनकर आए।

मजेदार बात यह है कि अपनी इस आध्यात्मिक यात्रा में कहीं भी प्रिंस ने अपनी वास्तविकता का आभाष किसी को नहीं होने दिया। राजसी ठाठ बाट छोड़कर वेल्स विमल कीर्ति बन गए, आइए ओशो के अनुयायियों या संन्यास जीवन की गहराइयों में उतरकर अनोखे जीवन के पन्ने पलटते हैं।
Prince Welf– यूरोप के राजघरानों से जुड़ी शाही कड़ी
वेल्फ का जन्म जर्मनी के हनोवर के राजसी घराने में 1947ई. में हुआ था उनकी माताश्री ग्रीस की महारानी थीं और इंग्लैंड के प्रिंस चार्ल्स उनके मामा थे। मौसी स्पेन की क्वीन थीं, ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ उनकी मामी थीं। करीब करीब जितने भी यूरोप में राजघराने थे सब उनके संबंधी थे।

सोचिए कि जो व्यक्ति महल, पार्टी और किंगडम वाला जीवन बिता रहा था वह 23 बरस की उमर में पत्नी बच्चे समेत भगवान रजनीश ओशो का शिष्य बन गया। सोचिए जिस व्यक्ति के हिस्से इतना बड़ा साम्राज्य विरासत में आना था उसने एक ऐसी राह चुनी जो उन्हें अमर बना गई।
Osho से मुलाकात, वेल्फ बने आनन्द विमलकीर्ति
सन 70 का दशक जब पूरी दुनिया में भगवान रजनीश ओशो की ख्याति फैल चुकी थी। उनके पुणे कोरेगांव स्थित रजनीश आश्रम में वेल्फ पहुंचकर ओशो का सानिध्य प्राप्त करते हैं, आचार्य रजनीश ने आश्रम के नियमानुसार उनका नाम करण किया अब प्रिंस सन्यासी Anand Vimalkirti कहलाने लगे।

मजेदार बात यह है कि विमलकीर्ति बौद्ध कथाओं का एक ऐसा कैरेक्टर था जो धनवान होने के बावजूद ज्ञान के उच्च शिखर को छूता है और यह संयोग था कि Prince Welf Ernst of Hanover भी कुछ ऐसा ही जीवन का चुनाव कर चुके थे। एक ओर जहां यूरोप में उनके स्वागत में सैकड़ों दरबान हाजिर रहते थे। अब खुद वह दरबान बनकर जीवन व्यतीत कर रहे थे लेकिन यह मजबूरी नहीं अपितु प्रिंस का चुनाव था।
ओशो की किताबों से उनके बारे में जानकारी मिलती है कि प्रिंस ने बुवारी अर्थात माली का कार्य, और टॉयलेट सफाई जैसे काम कर अपने अंदर के मैं का त्याग किया। ओशो रजनीश ने “वाइल्ड गीज एंड द वॉटर” जैसे प्रवचनों में उन्हें याद कर सम्मान दिया। विमल कीर्ति ने आध्यात्मिक चेतना जाग्रत कर वह सब पा लिया था जो मानव जीवन का उच्चतम बिंदु है। आनन्द साधक के तौर पर ओशो के महान शिष्यों में से एक हैं उन्होंने आचार्य रजनीश के प्रवचनों और दर्शन सत्रों में भाग लेकर जीवन की नश्वरता का ज्ञान अर्जित किया था।
जब मौत बनी महापरिनिर्वाण
10 जनवरी 1981 को आश्रम में कराटे के अभ्यास के दौरान हृदय गति रुक जाने की वजह से मात्र 34 वर्ष की सीमित आयु में विमलकीर्ति ने दुनिया को अलविदा कहा, ऐसा माना जाता है कि यह आनुवंशिक बीमारी थी जो राजघराने में कई पीढ़ियों से चली आ रही थी जिसे Hypertrophic Cardiomyopathy कहा जाता है इसमें हृदय की मांशपेशिया मोटी हो जाती हैं।

प्रिंस वेल्फ के साथी सन्यासी अरुणा के कथन अनुसार जब विमल की कुछ सांसे बची थी तब वह गुरु रजनीश के सामने मुस्कुरा रहे थे और कहा कि “मैने तुम्हे देख लिया” इसके बाद वह लीन हो जाते हैं। ओशो ने इसे 'महापरिनिर्वाण' कहा यानी कि अंतिम अवस्था में ज्ञान उदय की चरम सीमा तक पहुंचना, उन्होंने कहा कि विमलकीर्ति ने मौत के क्षणों में भी ज्ञान की प्राप्ति की इसलिए रोकर नहीं बल्कि हंसी खुशी उनकी अंतिम विदाई होनी चाहिए, अब उनकी रूह मुक्त है।
यह पहली बार था जब किसी की मौत को जश्न उत्सव के रूप में मनाया गया, यह घटना ओशो आंदोलन में मील का पत्थर साबित हुई, काफी समय बाद ओशो ने अपने एक प्रवचन में विमल कीर्ति के पत्रों का जिक्र किया जो उनके कमरे से मिले थे जिसमें लिखा था कि आचार्य रजनीश की कदमों की आहट ही उन्हें आनंदमय कर देती है।
रॉयल से रूहानियत: विमलकीर्ति की सीख
स्वामी विमल कीर्ति के जीवन से आज की पीढ़ी को सीखने की जरूरत है हमें यह समझना चाहिए कि जीवन क्षण भंगुर है और जीवन के अंतिम पलों में कुछ भी साथ नहीं जाना है अगर कुछ जाएगा तो वह है आपका आध्यात्मिक चेतना। प्रिंस वेल्फ चाहते तो अपना पूरा जीवन महलों में गुजार देते लेकिन महापरिनिर्वाण के समय जो उनकी आंखों में चमक थी वही उन्हें महान बनाती है।
प्रिंस से सन्यासी बने वेल्फ की जीवन यात्रा सिखाती है कि सटिस्फेक्शन ताज, पदवी या शाही खून में नहीं है बल्कि भीतर की साधना, विनम्रता और आत्मज्ञान में है। हम चाहे किसी भी पृष्ठभूमि से हों, असली विरासत वही है जो आत्मा को छू ले और दूसरों के लिए मार्गदर्शन छोड़ जाए।